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उत्तराखंड में ‘महंगे मेहमान’ बने बाघ-गुलदार! एक टाइगर पर ₹20 लाख सालाना खर्च, सरकार पर बढ़ा बोझ

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By Pahadnews24
May 5, 2026 • 1 min read
उत्तराखंड में ‘महंगे मेहमान’ बने बाघ-गुलदार! एक टाइगर पर ₹20 लाख सालाना खर्च, सरकार पर बढ़ा बोझ
उत्तराखंड में ‘महंगे मेहमान’ बने बाघ-गुलदार! एक टाइगर पर ₹20 लाख सालाना खर्च, सरकार पर बढ़ा बोझ (Photo: Pahad News)

रिपोर्ट: पहाड़ न्यूज़ 24

देहरादून: उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण अब केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि रेस्क्यू सेंटरों में रखे गए बाघ और गुलदार अब सरकार के लिए ‘महंगे मेहमान’ साबित हो रहे हैं। अनुमान के मुताबिक एक टाइगर पर सालाना करीब 20 लाख रुपये तक खर्च हो रहा है, जिससे सरकारी बजट पर दबाव बढ़ता जा रहा है।


 

राज्य में बीते कुछ वर्षों में टाइगर और लेपर्ड की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। जहां यह वन्यजीव संरक्षण की सफलता मानी जा रही है, वहीं इसके चलते मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। ऐसे में जो वन्यजीव इंसानों के लिए खतरा बनते हैं या घायल हो जाते हैं, उन्हें पकड़कर रेस्क्यू सेंटर में रखा जाता है, जहां उनके रख-रखाव पर भारी खर्च आता है।


 

उत्तराखंड में फिलहाल चार प्रमुख रेस्क्यू सेंटर संचालित हो रहे हैं—चिड़ियापुर (हरिद्वार), रानीबाग (नैनीताल), ढेला (कॉर्बेट टाइगर रिजर्व) और अल्मोड़ा मिनी जू। इन सभी केंद्रों में मिलाकर कुल 82 बाघ और गुलदार रखे गए हैं।


 

अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो चिड़ियापुर में 24 लेपर्ड, रानीबाग में 15 लेपर्ड और 3 टाइगर, ढेला में 14 टाइगर और 16 लेपर्ड, जबकि अल्मोड़ा मिनी जू में 10 लेपर्ड मौजूद हैं।


 

विशेषज्ञों के अनुसार एक टाइगर को रोजाना करीब 10 किलो मांस की जरूरत होती है, जिससे उसके भोजन, देखभाल और मेडिकल खर्च मिलाकर सालाना खर्च लाखों में पहुंच जाता है।


 

वन विभाग के सामने अब दोहरी चुनौती है—एक ओर वन्यजीवों का संरक्षण, तो दूसरी ओर बढ़ते खर्च और मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करना। आने वाले समय में यह मुद्दा राज्य की वन नीति और बजट के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है।


 

(पहाड़ न्यूज़ 24)


 

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