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“जीते हुए विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री, कोई और नहीं” – सुरेंद्र कुकरेती

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By Pahadnews24
May 2, 2026 • 1 min read
“जीते हुए विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री, कोई और नहीं” – सुरेंद्र कुकरेती
“जीते हुए विधायक तय करेंगे मुख्यमंत्री, कोई और नहीं” – सुरेंद्र कुकरेती (Photo: Pahad News)

देहरादून | उत्तराखंड राजनीति

उत्तराखंड में आगामी चुनावी सरगर्मियों के बीच मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर एक बार फिर नई बहस छिड़ गई है। उत्तराखंड क्रांति दल (यूकेडी) के केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती ने सीधे तौर पर "हाईकमान संस्कृति" पर निशाना साधते हुए मुख्यमंत्री चयन की प्रक्रिया पर अपनी बेबाक राय रखी है।

📍 मुख्यमंत्री का फैसला 'हाईकमान' नहीं, 'विधायक' करें

सुरेंद्र कुकरेती ने लोकतांत्रिक मूल्यों का हवाला देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री का चयन किसी बंद कमरे में या किसी एक व्यक्ति द्वारा थोपा नहीं जाना चाहिए। उनके बयान के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

  • लोकतंत्र की भावना: मुख्यमंत्री का फैसला केवल और केवल जनता द्वारा चुने गए विधायकों द्वारा ही किया जाना चाहिए।
  • क्षेत्रीय संतुलन: उत्तराखंड जैसे राज्य में नेतृत्व ऐसा होना चाहिए जो क्षेत्रीय भावनाओं और संतुलन को समझता हो, और यह तभी संभव है जब विधायकों की राय को प्राथमिकता दी जाए।
  • बड़े दलों पर निशाना: उन्होंने इशारा किया कि बड़े राष्ट्रीय दल अक्सर पहले ही चेहरा तय कर देते हैं, जो वास्तव में लोकतांत्रिक मर्यादाओं के खिलाफ है।

🤔 यूकेडी की नई चुनावी रणनीति?

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सुरेंद्र कुकरेती का यह बयान महज एक सुझाव नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है:

  1. खुद को विकल्प बनाना: यूकेडी इस बयान के जरिए खुद को अन्य राष्ट्रीय दलों की तुलना में अधिक लोकतांत्रिक और पारदर्शी विकल्प के रूप में पेश कर रही है।
  2. जनभावनाओं को भुनाना: उत्तराखंड की जनता अक्सर "दिल्ली दरबार" के फैसलों से असंतुष्ट रहती है, ऐसे में यह बयान स्थानीय भावनाओं को छू सकता है।

⚖️ हाईकमान बनाम विधायक दल

इस बयान के बाद प्रदेश के राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर राज्य का नेतृत्व तय करने का असली अधिकार किसके पास होना चाहिए। क्या उत्तराखंड में अब 'विधायक दल' की ताकत 'हाईकमान' के आदेशों पर भारी पड़ेगी?

पहाड़ न्यूज़ 24 कमेंट: उत्तराखंड क्रांति दल का यह रुख राज्य की राजनीति में नेतृत्व के चयन की पुरानी प्रक्रिया को चुनौती दे रहा है। यदि क्षेत्रीय दल इस विमर्श को जनता के बीच ले जाने में सफल रहते हैं, तो आने वाले समय में बड़े दलों के लिए भी अपनी कार्यप्रणाली को समझाना मुश्किल हो सकता है।

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